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    मंजूरी, प्रदर्शन और लाल फीताशाही: गुजरात में दलितों को बौद्ध धर्म अपनाने के लिए क्या झेलना पड़ता है

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldJuly 1, 2025

    व्यवस्थागत बहिष्कार का सामना कर रहे गुजरात के कई दलित परिवार बौद्ध धर्म की ओर रुख कर रहे हैं. लेकिन नौकरशाही बाधाओं के कारण इन धर्मांतरणों को आधिकारिक मान्यता मिलने में देरी हो रही है.

    नई दिल्ली: गुजरात के सूरत में रहने वाले एक 29 वर्षीय दलित मशीन ऑपरेटर के लिए जातीय भेदभाव से आज़ादी केवल धर्म बदलने से नहीं मिली. बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी, राज्य सरकार से आधिकारिक मंजूरी पाने में उन्हें दो साल लग गए—इस दौरान उन्हें प्रदर्शन और कागजी कार्यवाही से गुजरना पड़ा.

    इस साल 14 मई को उनका परिवार उन 80 दलित परिवारों में शामिल था जिन्हें धर्म परिवर्तन की सरकारी मंजूरी मिली—यह मंजूरी उनके लंबे संघर्ष का एक अहम पड़ाव था.

    इनकी यात्रा 14 अप्रैल 2023 को शुरू हुई, जो बी.आर. आंबेडकर की जयंती है. उस दिन गुजरात के 100 से ज़्यादा दलित परिवारों ने हिन्दू धर्म छोड़कर बौद्ध धर्म अपना लिया—वही धर्म जिसे अंबेडकर ने “सम्मान और समानता” का रास्ता मानते हुए चुना था.

    “उस दिन दोपहर को 80 परिवारों ने बौद्ध धर्म अपनाया। ये सभी दलित थे, जिन्हें वर्षों से समाज और सरकार ने भेदभाव और उपेक्षा का शिकार बनाया,” मशीन ऑपरेटर ने कहा, जिन्होंने अपने परिवार के पांच सदस्यों के साथ धर्म परिवर्तन किया और नाम न बताने की इच्छा जताई.

    उन्होंने कहा, “सालों पहले जब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया, लाखों लोगों ने उनका अनुसरण किया. उन्होंने सभी धर्मों का अध्ययन किया और पाया कि केवल बौद्ध धर्म ही ऐसा है जो समानता और भेदभाव-रहित समाज की बात करता है. हम मानते हैं कि हमने धर्म बदला नहीं, बल्कि अपने पुराने धर्म में लौटे हैं.”

    ये 80 परिवार अकेले नहीं हैं। पिछले तीन वर्षों में गुजरात में कई छोटे दलित परिवारों ने चुपचाप बौद्ध धर्म अपनाया है. उन्होंने इसका कारण समाज में फैलता भेदभाव और हिंसा बताया है. नवजात बच्चों से लेकर युवा माता-पिता और बुजुर्गों तक पूरे परिवारों ने एक साथ धर्म परिवर्तन किया. इनमें ज़्यादातर कामगार तबके के लोग हैं. कुछ युवा स्नातक भी हैं, जो गुजरात की विभिन्न फैक्ट्रियों में काम करते हैं.

    सूरत ज़िला मजिस्ट्रेट सौरभ पारधी के अनुसार, 2023 में 256 हिंदुओं ने बौद्ध धर्म अपनाया, 2024 में 172 और 2025 में अब तक 84 ने. प्रशासन के पास यह जानकारी नहीं है कि इनमें कितने दलित हिंदू थे.

    ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि 2023 में गुजरात में कम से कम 2,000 लोगों ने बौद्ध धर्म अपनाया. कुछ मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, राज्य में 40,000–50,000 धर्म परिवर्तन आवेदन अब भी लंबित हैं. लेकिन आधिकारिक मान्यता की प्रक्रिया धीमी रही है क्योंकि इसमें काफी कागजी प्रक्रिया और प्रशासनिक अड़चनें आती हैं.

    14 अप्रैल 2023 को हुए सामूहिक धर्म परिवर्तन में प्रक्रिया आसान थी, लेकिन असली समस्या बाद में शुरू हुई, जब उन्हें ज़िला मजिस्ट्रेट को जानकारी देकर धर्म परिवर्तन की अनुमति लेनी पड़ी. पारधी ने दिप्रिंट को बताया कि मंजूरी प्रक्रिया में स्थानीय पुलिस द्वारा जांच होती है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि धर्म परिवर्तन ज़बरदस्ती नहीं किया गया है. अगर किसी मामले में संदेह हो, तो विधिवत सुनवाई होती है. उन्होंने कहा, “मंजूरी मिलने में आमतौर पर तीन से नौ महीने लगते हैं। इसकी कोई तय समय सीमा नहीं है.”

    गुजरात फ्रीडम ऑफ रिलिजन एक्ट, 2003 (GFR एक्ट) के अनुसार, बल, प्रलोभन या धोखाधड़ी से किए गए धर्म परिवर्तन अवैध माने जाते हैं.

    अप्रैल 2024 में गुजरात सरकार ने राज्य में दलित हिंदुओं के बौद्ध धर्म अपनाने पर ध्यान दिया और कहा कि धर्म बदलने वाले व्यक्ति और उसे धर्म परिवर्तन करवाने वाला व्यक्ति, दोनों को ज़िला मजिस्ट्रेट को सूचना देकर अनुमति लेनी होगी. यह कानून धर्म परिवर्तन की प्रक्रिया को “और जटिल” बना देता है, ऐसा कम से कम तीन धर्मांतरित लोगों ने कहा.

    ‘यह इत्तिफाक नहीं, एक पैटर्न है’

    जटिल प्रक्रिया के बावजूद, कई दलितों का कहना है कि उनके खिलाफ बढ़ती हिंसा और भेदभाव ने उन्हें बौद्ध धर्म की ओर मोड़ा. सूरत की एक हीरा फैक्ट्री में काम करने वाले एक मजदूर ने दिप्रिंट से कहा, “आरएसएस और बीजेपी के आने के बाद यह और बढ़ गया.”

    उसने आगे कहा कि बहुत से दलितों के लिए हिन्दू धर्म में बने रहना अब “असहनीय” हो गया है, जबकि बौद्ध धर्म ने उन्हें सम्मान और आत्म-सम्मान का रास्ता दिखाया.

    उसने बताया कि बौद्ध धर्म अपनाने का विचार उसके लिए स्वाभाविक था. यह सब तब शुरू हुआ जब वह “अपरिचित” शब्द सुनते हुए बड़ा हुआ—गुजरात में ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रहे समुदाय को “अछूत” कहा जाता था.

    किशोरावस्था में उसने अंबेडकर की रचनाएं पढ़ना शुरू कीं और हिन्दू समाज में मौजूद जातिगत ऊंच-नीच पर सवाल उठाने लगा. 2018 में जब उसने आंबेडकर द्वारा स्थापित सामाजिक संगठन ‘स्वयं सैनिक दल’ (SSD) से जुड़ाव किया, तो उसका यह संकल्प और गहरा हो गया.

    29 वर्षीय इस मशीन ऑपरेटर ने बताया कि उसे दलित होने का अहसास पहली बार स्कूल में हुआ, जब उनके समुदाय के छात्रों को अपने बर्तन खुद लाने होते थे.

    पहली नौकरी में उसे यह भेदभाव और स्पष्ट दिखा, जब उसके समुदाय के लोगों को सामुदायिक रसोई में बर्तनों का इस्तेमाल करने नहीं दिया गया.

    वक्त के साथ उसने महसूस किया कि अच्छी नौकरियां हमेशा उसकी पहुंच से बाहर रहेंगी, क्योंकि इंटरव्यू में जाति पूछे जाने के बाद उसे कई बार नौकरी से मना कर दिया गया. आखिरकार उसे सूरत की हीरा फैक्ट्री में काम मिला. उसने कहा, “मैं मशीन ऑपरेटर हूं, लेकिन मेरी तनख्वाह सिर्फ 20,000 रुपये है. मैं यहां पिछले सात साल से काम कर रहा हूं.”

    उसकी परिस्थितियों और भारत में दलितों पर होने वाले हमलों की नियमित ख़बरों ने उसे और कई अन्य लोगों को यह महसूस कराया कि यह सब “संयोग नहीं बल्कि एक पैटर्न” है.

    उसने कहा, “मेरे आंबेडकरवादी दोस्तों ने कहा कि बौद्ध धर्म अपनाना ही सबसे अच्छा रास्ता है. तभी मैंने इसे लेकर और पढ़ाई शुरू की.”

    14 अक्टूबर 1956 को अंबेडकर ने नागपुर में करीब 3.65 लाख अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म अपनाया था, जो जाति व्यवस्था के “त्याग” का प्रतीक था. आंबेडकर मानते थे कि दलितों को सच्ची आज़ादी और सम्मान पाने के लिए धर्म परिवर्तन करना जरूरी है, ताकि वे जाति आधारित अत्याचार से मुक्त हो सकें.

    अपने धर्म परिवर्तन से लगभग दो दशक पहले ही आंबेडकर ने यह इरादा जाहिर कर दिया था और मुंबई में महार समुदाय से भी ऐसा करने का आग्रह किया था, जिससे यह ऐतिहासिक क्षण संभव हुआ.

    अपनी एक मशहूर स्पीच में आंबेडकर ने कहा था, “मैं हिन्दू धर्म में जन्मा, यह मेरे हाथ में नहीं था. लेकिन हिन्दू रहूं या नहीं, यह मेरे हाथ में है.”

    “गुजरात में ज़्यादातर दलित इसी पंक्ति को जीते हैं,” पहले उद्धृत मशीन ऑपरेटर ने कहा, जो इस बात को दर्शाता है कि अंबेडकर के शब्द समुदाय में कितनी गहराई से गूंजते हैं.

    उसने और समुदाय के कई अन्य दलितों ने माना कि “सामूहिक धर्म परिवर्तन” हाल के वर्षों में बढ़े हैं, खासकर जुलाई 2016 में गुजरात के ऊना कस्बे में जब गाय की रखवाली के नाम पर एक दलित परिवार के सात सदस्यों को बेरहमी से पीटा गया. इस घटना का वीडियो वायरल हुआ और उसके बाद राज्यभर में प्रदर्शन हुए.

    “मैंने अपने परिवार को बाबासाहेब (आंबेडकर) की किताबों से समझाया. मैंने उन्हें बताया कि धर्म की यह व्यवस्था हमेशा हमारे साथ भेदभाव करती रहेगी,” मशीन ऑपरेटर ने आंबेडकर को उद्धृत करते हुए कहा. “कोई भी ऐसा धर्म जो असमानता की व्यवस्था पर आधारित हो, वह हमेशा एक जाति के साथ भेदभाव करेगा और दूसरी को हावी करेगा. हिन्दू धर्म में यह व्यवस्था संयोग नहीं, बल्कि उसकी बुनियाद है.”

    ‘हमेशा एक बौद्ध’

    रत की एक डायमंड कंपनी में काम करने वाले एक 32 वर्षीय मशीन ऑपरेटर ने दिप्रिंट को बताया कि भले ही उन्होंने एक साल पहले समारोह में धर्मांतरण कर लिया था और अब वे एक प्रैक्टिसिंग बौद्ध हैं, लेकिन आधिकारिक रूप से खुद को बौद्ध कहने का मौका अब जाकर मिला है. उन्होंने कहा, “अंदर से मैं हमेशा से बौद्ध था. मैं बहुत मजबूती से बौद्ध धर्म अपनाना चाहता था क्योंकि इस धर्म में कोई ऊंच-नीच नहीं है.”

    उन्होंने बताया कि सालों से उनके समुदाय के लोगों को ऑफिसों में सीनियर पदों पर काम करने की अनुमति नहीं दी जाती, दूल्हों को घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया जाता, पुरुषों को मूंछ रखने की इजाजत नहीं होती, और महिलाओं के साथ बलात्कार और यौन शोषण आम बात थी. उन्होंने कहा कि वे एसएसडी के सदस्य हैं, जिसने लोगों को समझाया कि धर्मांतरण ज़रूरी है और अप्रैल 2023 में आयोजित धर्मांतरण समारोह की व्यवस्था की, जिसमें उन्होंने अपने नौ सदस्यों के परिवार के साथ धर्मांतरण किया.

    उन्होंने बताया कि जो लोग उस दिन धर्मांतरण करने वाले थे, उन सभी ने समारोह से पहले ऑनलाइन फॉर्म भरा था और मजिस्ट्रेट को एक महीने के अंदर अनुमति देनी थी. इस प्रक्रिया में धर्म परिवर्तन के कारणों की पूरी पुलिस जांच ज़रूरी होती है.

    उन्होंने कहा, “हमारी वेरिफिकेशन भी 12 मई तक नहीं हुई थी,” और बताया कि इस वजह से पूरी प्रक्रिया करीब दो साल तक चलती रही और अंत में 14 मई को उन्हें आधिकारिक अनुमति मिली. “हमें प्रदर्शन करना पड़ा और मजिस्ट्रेट से कहना पड़ा कि हम RTI फाइल करने वाले हैं। लगातार निवेदन के बाद आखिरकार हम धर्मांतरण कर सके.”

    उन्होंने यह भी कहा कि भले ही लोग उन्हें पूरी तरह से बौद्ध न मानें और उन्हें दलित ही कहते रहें, लेकिन यह धर्मांतरण उनके नौ साल के बेटे, जो परिवार का सबसे छोटा सदस्य है, के लिए अच्छा असर डालेगा. “उसे कुछ भी समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी, वह बस लोगों को कह सकेगा कि वह बौद्ध है.”

    दशकों की लामबंदी

    गुजरात में दलितों को दशकों से जाति आधारित हिंसा का सामना करना पड़ा है, लेकिन ये घटनाएं शायद ही कभी लंबे समय तक चलने वाले आंदोलनों में बदल पाती हैं, यह कहना है प्रोफेसर घनश्याम शाह का, जो जाति और सामाजिक आंदोलनों पर प्रमुख विद्वान हैं और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के रिटायर्ड प्रोफेसर हैं.

    उन्होंने दिप्रिंट से कहा: “जहां तक अत्याचारों की बात है, वे सालों से काफी अधिक बने हुए हैं,” उन्होंने कहा. “जब अत्याचार होते हैं, तो प्रतिक्रिया होती है. लेकिन भावनाएं जल्दी ठंडी पड़ जाती हैं.”

    हालिया बौद्ध धर्म में धर्मांतरण पर टिप्पणी करते हुए शाह ने कहा कि यह रुझान व्यापक नहीं है बल्कि मुख्य रूप से वणकर समुदाय (परंपरागत रूप से बुनकर) तक सीमित है, जो एक दलित उप-समूह है और जिसे शिक्षा और शहरी जीवन तक अपेक्षाकृत बेहतर पहुंच मिली है. उन्होंने कहा कि वणकरों की सोच थोड़ी अधिक सुधारवादी है, लेकिन दलितों के भीतर भी जातीय ऊंच-नीच बनी हुई है. “वे खुद को अन्य दलित जातियों से ऊपर मानते हैं, और इसी कारण अलगाव की भावना पैदा होती है.”

    शाह ने स्वीकार किया कि 2016 में ऊना में हुई घटना, जिसमें दलित युवकों की पिटाई की गई थी, ने थोड़े समय के लिए अलग-अलग दलित उप-जातियों और क्षेत्रों को एकजुट किया.

    “उस समय आंदोलन 6-7 महीने तक चले,” उन्होंने कहा, लेकिन वे धीरे-धीरे खत्म हो गए और सामूहिक गुस्से को टिकाऊ राजनीतिक कार्रवाई में नहीं बदला जा सका. “मुझे नहीं लगता कि ऊना के बाद धर्मांतरण में कोई बड़ा इजाफा हुआ, हालांकि उस समय लोगों की एकजुटता असली थी.”

    ऐतिहासिक संदर्भ में बात करते हुए शाह ने कहा कि गुजरात उन शुरुआती राज्यों में रहा है जहां 1981 से ही दलित विरोधी भावनाएं देखने को मिलीं, जब आरक्षण विरोधी आंदोलन शुरू हुए. ये आंदोलन ‘सवर्णों’ द्वारा दलितों की सामाजिक तरक्की के विरोध में शुरू हुए थे, खासकर मध्य और उत्तर गुजरात में, जहां कुछ दलितों ने उच्च शिक्षा और ज़मीन के अधिकारों तक पहुंच बनानी शुरू की थी. “इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के समय जो भूमि सुधार हुए, उनमें दलितों को ज़मीन मिलने लगी, और यह बात दबंग जातियों को रास नहीं आई,” उन्होंने समझाया.

    उसी दौर में, बॉम्बे में शुरू हुई दलित पैंथर आंदोलन गुजरात में भी फैल गई, जिसने दलितों को सवर्णों की सरकारी ज़मीन पर कब्जा करने के लिए प्रेरित किया. शाह ने बताया कि इसके जवाब में बहुत ही हिंसक प्रतिक्रिया हुई.

    युवा भीम सेना के संस्थापक डी. डी. सोलंकी, जो अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) समुदायों को कानूनी सहायता प्रदान करते हैं, ने दिप्रिंट से कहा कि रोज़ाना के भेदभाव, जैसे स्थानीय हैंडपंप से पानी भरने से रोका जाना, धर्मांतरण को अंबेडकरवादी दलितों के लिए एक मिशन बना देता है.

    उन्होंने कहा, “कोई भी दलितों को जबरन धर्मांतरण के लिए नहीं कहता, वे आंबेडकर को पढ़ते हैं और खुद निर्णय लेते हैं.”

    दलित महिलाओं के खिलाफ हिंसा

    जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर शाह ने दिप्रिंट को बताया कि गुजरात में दलित महिलाओं के खिलाफ शोषण का लंबा इतिहास रहा है. उन्होंने कहा, “1970 के दशक में तो यह लगभग आम बात थी कि सवर्ण पुरुष दलित महिलाओं का यौन शोषण करें.”

    सबसे हालिया मामलों में से एक में, मई 2023 में आगरा में एक दलित महिला के घर में जबरन घुसने वाले एक व्यक्ति द्वारा उसके नाबालिग बच्चों के सामने उसके साथ बलात्कार किया गया था. राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2014 में 5,149 घटनाओं की रिपोर्ट की गई और 2022 में 9,163 घटनाओं की रिपोर्ट की गई, जिसके बीच दलित महिलाओं और लड़कियों के खिलाफ हिंसा में राष्ट्रीय स्तर पर 78 प्रतिशत की वृद्धि हुई है.

    एक 31 वर्षीय निजी स्कूल में पढ़ाने वाली शिक्षिका, जिन्होंने हाल ही में बौद्ध धर्म अपनाया, ने दिप्रिंट को बताया कि एक महिला होने के नाते उन्हें सालों से बुरा बर्ताव झेलना पड़ा और उन्होंने समाज में पूरी तरह से अलगाव को महसूस किया. उन्होंने कहा, “हमारे मंदिर भी अलग हुआ करते थे.”

    स्थिति और भी खराब तब होती है जब गांवों में दलित महिलाओं को आज भी यौन उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है. उन्होंने कहा, “मेरी कुछ दलित महिला दोस्त गांवों में रहती हैं. वहां सवर्ण लोग खासकर पीरियड्स के दौरान दलित महिलाओं के साथ भेदभाव करते हैं.”

    उन्होंने यह भी कहा कि एक महिला होने के नाते वह हमेशा घूंघट की प्रथा के खिलाफ रही हैं, जिसमें महिलाओं को सिर ढकना होता है और बोलने की अनुमति नहीं होती. उन्होंने कहा, “मैंने सिर पर घूंघट डालने से इनकार कर दिया था.”

    2011 की जनगणना के अनुसार, दलित महिलाएं भारत की कुल महिलाओं का लगभग 16 प्रतिशत हैं और ऐतिहासिक रूप से, बलात्कार का इस्तेमाल सवर्ण समुदायों द्वारा दलित समुदाय को नीचा दिखाने के लिए किया गया है.

    उन्होंने कहा कि दलित महिलाएं अक्सर “आसान निशाना” बन जाती हैं क्योंकि सवर्ण पुरुषों को लगता है कि दलित महिलाएं “इसके लायक हैं.”

    उन्होंने कहा, “इसी वजह से हम बौद्ध धर्म में विश्वास करते हैं। यह हमें सिखाता है कि महिलाएं बराबर हैं.”

    उन्होंने धर्मांतरण इसलिए किया ताकि उनका तीन साल का बेटा एक ऐसे माहौल में बड़ा हो जो किसी भी भेदभाव से दूर हो. उन्होंने कहा, “मैं उसके लिए कुछ छोड़कर जाऊंगी, ताकि वह अपने लोगों के संघर्ष को समझ सके. लेकिन मैं उसे इस संघर्ष का हिस्सा नहीं बनने दूंगी.”

    वह SSD (स्वयं सैनिक दल) के तहत काम करने वाली उन महिलाओं में शामिल हैं जो घर-घर जाकर दलित महिलाओं को उनके अधिकारों और शिक्षा की ज़रूरत के बारे में जागरूक करती हैं. उन्होंने कहा, “हमें ज़्यादा पढ़ी-लिखी दलित महिलाओं की ज़रूरत है. अगर महिला पढ़ी-लिखी होगी, तो उसके बच्चे भी पढ़ेंगे.”

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