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    100% एथनॉल की दौड़ में सूखता महाराष्ट्र, प्यासे इलाकों पर बढ़ा खतरा

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMay 11, 2026

    एक लीटर एथनॉल बनाने के लिए 10,000 लीटर तक पानी की जरूरत होती है। एक टन गन्ने के रस से सिर्फ 70 लीटर एथनॉल बनता है। फिर भी, केन्द्र सरकार चाहती है कि गाड़ियां 100 फीसद एथनॉल से चलें।

    जयदीप हार्दिकर

    Published: 11 May 2026, 3:19 PM

    आज केवल आज की चिंता करो। महाराष्ट्र के सूखा-ग्रस्त जिले धाराशिव के तकविकी गांव के किसानों ने 2013 की गर्मियों में यही रणनीति अपनाई थी। पानी की भारी कमी ने गांव की अर्थव्यवस्था तबाह कर दी थी और लोग गांव छोड़कर जाने लगे थे। तब से मराठवाड़ा क्षेत्र-जिसमें तकविकी भी आता है-में तीन और भयानक सूखे पड़ चुके हैं; और हर बार, गांव के कुछ लोग घर-बार छोड़ते गए।

    उस साल महाराष्ट्र ने 8 करोड़ टन गन्ने की पेराई करके 80 लाख क्विंटल चीनी का उत्पादन किया था। धाराशिव की चीनी मिलों ने 25 लाख टन से भी ज्यादा गन्ने की रिकॉर्ड पेराई की। इस गांव और राज्य के सूख प्रभावित दर्जनों गांवों की यात्रा के दौरान मैंने एक विरोधाभास साफ देखाः जिन गांवों में पीने के पानी के लिए टैंकरों की अधिक मांग होती है, वहीं भारी मात्रा में गन्ने की फसल उगाई जाती है जिसके लिए काफी पानी की जरूरत होती है। हर साल, किसान गन्ने की सिंचाई के लिए गहरे बोरवेल खोदते हैं; यह पानी उन फैक्टरियों को जाता है जो लाखों टन चीनी और अब एथनॉल बनाती हैं। दूसरी ओर, लोगों का बड़ा तबका पीने के पानी के लिए तरसता रहता है। कुछ साल पहले, महाराष्ट्र सरकार की ‘ग्राउंडवॉटर सर्वेज एंड डेवलपमेंट एजेंसी’ के एक भूविज्ञानी ने मुझे बताया था कि मराठवाड़ा क्षेत्र फलों के बाग और गन्ने की खेती के लिए ‘पुरापाषाण काल’ का पानी भी सोख रहा है। यह संकट इतना गंभीर है।

    2023 में जब एक जिला कलेक्टर ने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को चिट्ठी लिखकर अनुरोध किया कि पीने के पानी की जरूरतें पूरी करने के लिए दीवाली से मार्च तक चलने वाले गन्ने की पिराई के सीजन को रोक दिया जाए, तो पूरा राजनीतिक वर्ग उनके खिलाफ उठ खड़ा हुआ। उन्हें फटकार मिली और तबादला कर दिया गया। लोगों को पानी खरीदना पड़ा, लेकिन चीनी मिलें लाखों लीटर पानी का इस्तेमाल करती रहीं।

    अब आते हैं 2026 पर। पानी का संकट और गहरा है, फिर भी केन्द्र सरकार चाहती है कि गाड़ियां 100 फीसद एथनॉल पर चलें ताकि पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण पैदा ईंधन संकट से निपटा जा सके। सरकार चीनी मिलों के लिए रेगुलेटरी फ्रेमवर्क बदलना चाहती है, ताकि चीनी, शीरा और दूसरे बाय-प्रोडक्ट्स के साथ-साथ एथनॉल भी इसमें शामिल हो सके। भारत वाहन तेल में 100 फीसद इथेनॉल ब्लेंडिंग का स्तर पाना चाहता है। तेल कंपनियां एथनॉल खरीद बढ़ा रही हैं और महाराष्ट्र की चीनी मिलें अपनी डिस्टिलेशन क्षमता। पिछले पांच सालों से, केन्द्र और राज्य सरकारों ने निजी और सहकारी चीनी मिलों को इथेनॉल उत्पादन में निवेश के लिए प्रोत्साहित किया है। लेकिन एथनॉल का मामला सिर्फ ऊर्जा से जुड़ा नहीं, बल्कि इस बारे में भी है कि पानी का इस्तेमाल कैसे किया जा रहा। हाल ही में नरेन्द्र मोदी सरकार ने भारत में कारों को पूरी तरह एथनॉल पर चलाने की दिशा में कदम उठाया। आम स्थिति में इसका स्वागत होता लेकिन यह आम स्थिति नहीं। पश्चिम एशिया के तनाव ने वैश्विक तेल आपूर्ति को बाधित किया है , जिससे ईंधन की कमी का डर बढ़ गया है।

    अप्रैल 2026 के शुरू में, उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण मंत्रालय ने ‘गन्ना (नियंत्रण) आदेश 2026’ का मसौदा जारी किया, जिसका उद्देश्य 1966 के आदेश की जगह लेना और ‘चीनी क्षेत्र का आधुनिकीकरण’ है। इसके लक्ष्यों और कारणों के अलावा, मसौदे के 14 मुख्य प्रस्तावों में एक यह है कि रेगुलेटरी दायरे में गन्ने के रस, सिरप और शीरे से इथेनॉल उत्पादन भी शामिल किया जाए। इस नीति में दो गंभीर जोखिम छिपे हैं।

    पानी की कमी

    मौसम विभाग समेत कई एजेंसियों के पूर्वानुमानों के मुताबिक, अल नीनो के कारण, 2026-27 का मॉनसून सामान्य से 8 फीसद कम रह सकता है। केन्द्र सरकार से लेकर नगर पालिकाओं तक सब पानी की कमी से निपटने की तैयारी में जुटे हैं। मुंबई जैसे शहरों ने पानी की कटौती की घोषणा की है। इस पृष्ठभूमि में, एथनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने पर सवाल खड़ा होता है। एक लीटर इथेनॉल बनाने में 10,000 लीटर तक पानी लग सकता है। यहां तक कि जब चावल या मक्का जैसे अनाजों से इसे बनाया जाता है, तब भी इसकी क्षमता सीमित होती है- एक टन अनाज से लगभग 475 लीटर एथनॉल बनता है। तो इथेनॉल की ज्यादा मिक्सिंग का फैसला आर्थिक और पर्यावरणीय रूप से कितना सही है?

    भारत में एथनॉल मुख्य रूप से गन्ने से बनता है। अकेले महाराष्ट्र में करीब 350 चीनी मिलों ने इथेनॉल बनाने पर भारी निवेश किया है। फिर भी, एक टन गन्ने के रस से सिर्फ 70 लीटर एथनॉल बनता है। एथनॉल बनाने की प्रक्रिया दो तरह से पानी पीती है- पहला, गन्ने की फसल में ज्यादा पानी चाहिए होता है, और दूसरा, उससे इथेनॉल बनाने में।

    जरूरत से ज्यादा उत्पादन क्षमता

    मौजूदा ऊर्जा संकट से पहले, सरकारी प्रोत्साहन के कारण इथेनॉल उत्पादन क्षमता एक दशक पहले के 518 करोड़ लीटर से बढ़कर आज 2,000 करोड़ लीटर हो गई है। हालांकि, अभी मांग 1,100 करोड़ लीटर है। दूसरे शब्दों में, उत्पादन क्षमता मांग से कहीं ज्यादा है।

    गन्ने से बनने वाला एथनॉल चावल और मक्का जैसे अनाजों से बनने वाले ‘नए’ एथनॉल के आगे फीका पड़ता जा रहा है। ऐसा लगता है कि सरकारी खरीद नीतियां नए उत्पादकों के पक्ष में हैं, जिससे गन्ने पर आधारित पारंपरिक एथनॉल उत्पादक- मुख्यतः चीनी मिलें- अनिश्चितता का सामना कर रही हैं। महाराष्ट्र और अन्य जगहों पर, करीब 350 उत्पादकों ने पिछली नीतियों से प्रोत्साहित होकर भारी निवेश किया है। लेकिन तेल कंपनियां कुल उत्पादन का आधा ही खरीद रही हैं, जिससे उत्पादकों को निवेश वापस पाने में मुश्किल हो रही है। अगर भारत 20 फीसद ब्लेंडिंग से 85-100 फीसद एथनॉल पर जाता है, तो मांग में जबरदस्त वृद्धि होगी। लेकिन एथनॉल का ऊर्जा घनत्व पेट्रोल-डीजल से कम होता है। यानी समान दूरी तय करने में गाड़ियों को ज्यादा एथनॉल की जरूरत होगी और ज्यादा खपत होने से एथनॉल की मांग बढ़ेगी। इसका सीधा मतलब है कि पानी की खपत भी बढ़ेगी।

    अभी, भारत के फसल पैटर्न करीब 30 फीसद तक की एथनॉल ब्लेंडिंग को सपोर्ट कर सकते हैं। 85-100 फीसद तक पहुंचने के लिए एथनॉल बनाने वाली फसलों की उपज में भारी वृद्धि करनी होगी। इससे और भी चिंताएं पैदा होती हैं। गन्ना और चावल ज्यादा पानी वाली फसलें हैं। फिर भी, राजनीतिक कारणों और खाद्य सुरक्षा की वजह से उन्हें सरकारी मदद मिलती रही। इससे जल संसाधन पर दबाव बढ़ रहा है। इसके अलावा, जरूरत से ज्यादा सिंचाई से मिट्टी में खारापन और जमीन का बंजर होना जैसे खतरे भी पैदा होते हैं, जैसा कि सतारा में दिखा।

    एथनॉल ने इस क्षेत्र के आर्थिक समीकरण को बदल दिया है। अब मिलों के पास वैकल्पिक बाजार है। जैव-ईंधन के प्रबल समर्थक नितिन गडकरी ने हाल ही में दावा किया कि एथनॉल के बिना पश्चिमी महाराष्ट्र की ज्यादातर मिलें बंद हो गई होतीं। शक नहीं कि एथनॉल ने मिलों को फिर जिंदा किया है, लेकिन इसका विस्तार गन्ने और पानी पर निर्भर है, जो पानी की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा को नजरअंदाज करता है।

    महाराष्ट्र के एथनॉल की ओर मुड़ने के पीछे एक जानी-पहचानी राजनीतिक अर्थव्यवस्था है जो नए रूप में सामने आई है। सहकारी चीनी मिलें निजी कृषि-औद्योगिक केन्द्रों में बदल गई हैं, जो गन्ने को चीनी, बिजली और ईंधन में बदलती हैं। मिलों पर नियंत्रण का मतलब है ऋण समितियों, परिवहन ठेकों, मजदूर नेटवर्क, सब्सिडी और आखिरकार चुनावी प्रभाव पर नियंत्रण- खासकर पश्चिमी महाराष्ट्र में। इथेनॉल इस नेटवर्क को मजबूत करता है। तेल कंपनियों द्वारा पक्की खरीद के जरिये नकदी के प्रवाह को बेहतर बनाकर, यह सहकारी और निजी, दोनों तरह की मिलों को मजबूत करता है, जो अलग-अलग पार्टियों के राजनीतिक परिवारों से जुड़ी हैं।

    इसके लाभार्थी कई स्तरों पर हैं: मिल मालिकों को आय के नए स्रोत मिलते हैं, राजनीतिक लोग अपना प्रभाव मजबूत करते हैं, और बड़े गन्ना किसानों को ज्यादा और तय भुगतान से लाभ होता है। हालांकि, इसके नुकसान अधिक व्यापक हैं- मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों को इसका बोझ उठाना पड़ता है, जहां गन्ना उत्पादन के लिए भूजल का अत्यधिक दोहन होता है, और छोटे किसान भी अधिक पानी वाली फसल उगाने को मजबूर हैं क्योंकि मिलें स्थानीय फसल पैटर्न निर्धारित करती हैं। दरअसल, एथनॉल ने चीनी अर्थव्यवस्था का लोकतंत्रीकरण नहीं किया; इसने इसे सहकारी नेतृत्व वाले मॉडल से सहकारी समितियों और निजी मिलों की संकर व्यवस्था की ओर मोड़ दिया है, जिससे जल, पूंजी और राजनीतिक शक्ति का संबंध और मजबूत हुआ।

    जैसा कि अमे तिरोडकर ने फ्रंटलाइन में लिखा है, ‘चीनी ने महाराष्ट्र की सहकारी शक्ति संरचना का निर्माण किया’ जो अब दबाव में है। पारंपरिक सहकारी मॉडल नए रूप में सामने आ रहा है। पूंजी और राजनीतिक समर्थन वाली मिलें डिस्टिलरी में निवेश करके राजस्व के नए स्रोत सुरक्षित कर रही हैं, जबकि कमजोर सहकारी समितियां हजारों करोड़ के बकाये से जूझ रही हैं। इसका परिणाम एक नया स्वरूप है: व्यापक सहकारी नेटवर्क से एक अधिक असमान परिदृश्य की ओर, जहां निजी मिलें और राजनीतिक रूप से संबद्ध संस्थाएं अपना नियंत्रण मजबूत कर रही हैं।

    इस परिवर्तन में, एथनॉल एक स्थिरकर्ता और फिल्टर दोनों की भूमिका में है – निवेश करने वालों को लाभ पहुंचा रहा और निवेश न कर पाने वालों को हाशिए पर धकेल रहा। लाभ मिल मालिकों और राजनीतिक नेताओं को मिल रहा है, जबकि जोखिम – जल की कमी, फसलों पर निर्भरता और आय में अस्थिरता – किसानों और मजदूरों पर थोपे जा रहे हैं।

    महाराष्ट्र में, गन्ना सिर्फ फसल नहीं, बल्कि सत्ता की एक व्यवस्था है। कोल्हापुर और सांगली से लेकर अहमदनगर और सोलापुर तक, चीनी का भूगोल राजनीतिक भूगोल से जुड़ा है। ऐतिहासिक रूप से, सहकारी मिलों ने स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को मजबूती दी है, और कर्ज, रोजगार और चुनावी लामबंदी तक पहुंच को आकार दिया है। इथेनॉल इस व्यवस्था को और मजबूत करता है।

    मिलों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाकर, यह चीनी नेटवर्क की संस्थागत सत्ता को और पक्का करता है। यह किसानों को गन्ने की खेती तक सीमित करता है। अध्ययन कहते हैं कि महाराष्ट्र में गन्ना उत्पादन में वृद्धि उत्पादकता की तुलना में खेती के रकबे में हुई बढ़ोतरी के कारण ज्यादा हुई है; यह संकेत है कि यह फसल अलग-अलग क्षेत्रों में लगातार फैल रही है। यह विस्तार अब ज्यादातर मराठवाड़ा जैसे सूखा-संभावित क्षेत्रों, या पश्चिमी महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों की ओर बढ़ रहा है, जहां इसके पर्यावरणीय दुष्परिणाम कहीं ज्यादा हैं।

    इस बदलाव का असर पूरे महाराष्ट्र में एक जैसा नहीं है। पश्चिमी महाराष्ट्र, जहां नहरों से सिंचाई की व्यवस्था है और बारिश भी ज्यादा होती है, वहां ऐतिहासिक रूप से गन्ने की खेती को बढ़ावा मिला है। कोल्हापुर, सांगली और पुणे जैसे इलाके ‘शुगर बेल्ट’ का मुख्य हिस्सा हैं। लेकिन मराठवाड़ा और विदर्भ के कुछ हिस्सों की कहानी अलग है। यहां, गन्ने की खेती भूजल पर निर्भर है। बार-बार पड़ने वाले सूखे ने इस मॉडल की कमजोरी को पहले ही उजागर कर दिया है। इसके बावजूद, चीनी मिलों से मिलने वाले आर्थिक फायदे की वजह से इन इलाकों में गन्ने की खेती का रकबा बढ़ रहा है। एथनॉल की वजह से यह चलन और तेज हो सकता है। बदलाव का असर फसल विविधता पर भी पड़ रहा है। जैसे-जैसे ज्यादा जमीन गन्ने के लिए इस्तेमाल हो रही है, मोटे अनाज, दालों और तिलहनों के लिए पानी उपलब्धता घटती जा रही है- ये ऐसी फसलें हैं जो पोषण और पर्यावरण, दोनों लिहाज से सूखी जमीन के लिए ज्यादा उपयुक्त हैं। असल में, एथनॉल जहां राज्य के लिए ऊर्जा के नए विकल्प खोल रहा है, वहीं राज्य के कृषि विकल्पों को सीमित कर रहा है और जल संकट को गहरा रहा है।

    (जयदीप हार्दिकर नागपुर के वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने ‘रामराव: द स्टोरी ऑफ इंडियाज फार्म क्राइसिस’ किताब लिखी है।)

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