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    अवसरवाद की राह पर भटकती सिद्धांतविहीन भारत की विदेश नीति

    Jodhpur HeraldBy Jodhpur HeraldMarch 17, 2026

    शांति स्थापित करने या नियम-आधारित व्यवस्था को फिर से कायम करने की बड़ी प्रक्रिया में हमारी कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि हमारा सिद्धांत अवसरवाद बन गया है।

    आकार पटेल

    आकार पटेल

    Published: 15 Mar 2026, 9:00 PM

    4 नवंबर 2013 को, तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भारतीय मिशनों के 120 से अधिक प्रमुखों से बात की और उन पांच सिद्धांतों की रूपरेखा रखी, जिनसे उनकी सरकार की विदेश नीति परिभाषित होती थी। ये सिद्धांत थे: पहला, यह समझ और मान्यता कि दुनिया के देशों—खासकर बड़ी शक्तियों और एशियाई पड़ोसियों—के साथ भारत के संबंध उसकी विकास संबंधी ज़रूरतों और प्राथमिकताओं से तय होते हैं।

    मनमोरन सिंह ने कहा कि “भारतीय विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य ऐसा वैश्विक माहौल बनाना होना चाहिए जो हमारे महान देश के कल्याण के लिए अनुकूल हो।”

    दूसरा, यह कि विश्व अर्थव्यवस्था के साथ अधिक जुड़ाव भारत के लिए लाभकारी होगा और इससे भारतीयों को अपनी रचनात्मक क्षमता को साकार करने का अवसर मिलेगा।
    तीसरा, सभी प्रमुख शक्तियों के साथ स्थिर, दीर्घकालिक और पारस्परिक रूप से लाभकारी संबंध स्थापित करना। और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ मिलकर ऐसा वैश्विक आर्थिक और सुरक्षा वातावरण बनाना जो सभी देशों के लिए लाभकारी हो।

    चौथा, यह पहचानना कि भारतीय उपमहाद्वीप के साझा भविष्य के लिए ज़्यादा क्षेत्रीय सहयोग और कनेक्टिविटी की ज़रूरत है। पांचवां, एक ऐसी विदेश नीति जो सिर्फ़ हितों से ही नहीं, बल्कि उन मूल्यों से भी तय हो जो भारतीयों को प्रिय हैं: ‘एक बहुलवादी, धर्मनिरपेक्ष और उदार लोकतंत्र के दायरे में आर्थिक विकास करने के भारत के प्रयोग ने दुनिया भर के लोगों को प्रेरित किया है और इसे आगे भी ऐसा ही करते रहना चाहिए।’ यह इस बात की साफ़ व्याख्या थी कि क्या हासिल करने की कोशिश की जा रही थी।

    भारत अपनी विदेश नीति का इस्तेमाल अपने आर्थिक विकास को आगे बढ़ाने के लिए करेगा; वह दुनिया की बड़ी ताकतों और अपने पड़ोसियों के साथ दोस्ताना संबंध रखेगा; और ऐसा करने में उसे एक बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र बने रहने से मदद मिलेगी।

    मैं मौजूदा सरकार की विदेश नीति के सिद्धांतों पर चर्चा नहीं करूंगा, खासतौर से इसलिए क्योंकि उसके पास कोई सिद्धांत हैं ही नहीं। यह न तो कोई आरोप है और न ही कोई हल्की-फुल्की टिप्पणी; मैंने एक किताब में पूरा अध्याय लिखकर समझाया है कि ऐसा क्यों है। दरअसल स्थिति यह है कि विदेश मंत्री न केवल यह स्वीकार करते हैं कि हमारी नीति के कोई सिद्धांत नहीं हैं, बल्कि वे कहते हैं कि सिद्धांतों का अभाव ही हमारी नीति का आधार है।

    अपने लेखों और भाषणों के संकलन वाली एक पुस्तक में उन्होंने स्पष्ट किया है कि उनका आशय क्या है। उनके अनुसार भारत एक “बहुध्रुवीय एशिया” चाहता है, यानी ऐसा एशिया जिसमें भारत चीन की बराबरी का दावा कर सके। लेकिन इसे हासिल करने का कोई तरीका वे नहीं बताते; वे बस यह मान लेते हैं कि केवल हमारी इच्छा भर से ऐसा हो जाएगा।

    वे लिखते हैं कि कई गेंदों को एक साथ हवा में बनाए रखने की जादूगरी दिखानी होगी (जयशंकर को तैयार मुहावरों का इस्तेमाल करने का खास शौक है) और भारत उन्हें कुशलता से संभाल लेगा। यह दरअसल अवसरवाद है, लेकिन उनके अनुसार इसमें कोई बुराई नहीं है, क्योंकि अवसरवाद ही भारत की संस्कृति है।

    जयशंकर लिखते हैं कि महाभारत से यही सबक मिलता है कि छल और अनैतिकता दरअसल केवल “नियमों के अनुसार न खेलने” का ही रूप हैं। द्रोणाचार्य द्वारा एकलव्य से उसका अंगूठा मांगना, इंद्र द्वारा कर्ण का कवच छीन लेना, और अर्जुन का शिखंडी को मानव ढाल के रूप में इस्तेमाल करना—ये सब उनके अनुसार सिर्फ “प्रथाएँ और परंपराएँ” थीं। नीति में असंगति भी न केवल स्वीकार्य है बल्कि आवश्यक है, क्योंकि बदलती परिस्थितियों में “निरंतरता को लेकर अत्यधिक आग्रह करना” बहुत महत्वपूर्ण नहीं है।

    यह एक ऐसे व्यक्ति की बात है जो किसी ठोस आधार न रखने वाली बात को भी शब्दों में इस तरह ढाल सकता है कि वह तर्कसंगत लगे। लेकिन ऐसे सिद्धांत को क्या नाम दिया जाए? एक भाषण में, जहां उन्होंने पहली बार अवसरवाद और असंगति के इस सिद्धांत को सामने रखा, जयशंकर ने कहा कि इसे कोई नाम देना कठिन है। वे ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ जैसे शब्द को उठाकर छोड़ देते हैं (कहते हैं कि यह बहुत अवसरवादी लगता है) और ‘इंडिया फर्स्ट’ को भी खारिज कर देते हैं (क्योंकि यह स्वार्थी प्रतीत होता है)। अंततः वे “समृद्धि और प्रभाव को आगे बढ़ाना” इस वाक्यांश पर ठहरते हैं, जिसे वे सही तो मानते हैं, लेकिन यह भी स्वीकार करते हैं कि यह बहुत आकर्षक या प्रभावी नहीं लगता।

    उनका मानना है कि यदि इस नीति को लंबे समय तक अपनाया गया, तो अंततः इसका कोई न कोई नाम अपने-आप सामने आ जाएगा, क्योंकि चुनौती का एक कारण यह भी है कि हम अभी एक बड़े परिवर्तन के शुरुआती चरण में ही हैं।

    यह कुछ समय पहले, इस सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान प्रकाशित हुई थी। लेकिन जैसा कि हम अपने चारों ओर देख सकते हैं, दुनिया बदल चुकी है। यह अधिक अनिश्चित हो गई है और खासकर उन देशों के लिए अधिक खतरनाक भी हो गई है, जो हमारी तरह ऊर्जा और बाहरी रोजगार—खासकर खाड़ी देशों—पर निर्भर हैं।

    डोनाल्ड ट्रम्प ने तीसरा खाड़ी युद्ध शुरू करने के लिए कोई ठोस कारण नहीं दिया है और न ही उन्होंने सामरिक उद्देश्यों के अलावा ऐसे किसी स्पष्ट लक्ष्य को सामने रखा है जिसे वे हासिल करना चाहते हों।

    अमेरिका के रक्षा मंत्री अपनी प्रेस ब्रीफिंग में पूरी तरह अस्थिर और अक्षम दिखाई देते हैं। यह युद्ध कैसे समाप्त होगा, इसका किसी को पता नहीं है, क्योंकि इसका अंत कब और कैसे होगा इसमें ईरान की भी अहम भूमिका होगी। ईरान पर हमले में इज़रायल की भागीदारी से यह युद्ध खास तौर पर चिंताजनक बन गया है, क्योंकि अमेरिका की तरह वह चाहकर भी अचानक पीछे नहीं हट सकता। वह इस क्षेत्र का ही हिस्सा है और परमाणु हथियारों से लैस है।

    ऐसे समय में भारत को क्या करना चाहिए और उसे कौन-सी नीति अपनानी चाहिए? संभव है कि हम वही करके आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हों, जिसकी सलाह जयशंकर देते हैं। और हम जो कर रहे हैं, उसे देखकर ऐसा लगता है कि हमने अवसरवाद की ही राह अपनाई है। युद्ध शुरू होने से कुछ ही घंटे पहले, जब सैन्य तैयारियां पूरी हो चुकी थीं, हम तेल अवीव गए थे और एक पदक ग्रहण किया था, मानो आने वाली घटनाओं का समर्थन कर रहे हों।

    हम ईरान में अमेरिका और इज़रायल के हाथों की जाने वाली हत्याओं की निंदा करने से भी कतराए हैं—चाहे वह स्कूली लड़कियों की सामूहिक हत्या हो या युद्ध की औपचारिक घोषणा के बिना नाविकों की हत्या। और जहां हमें कोई अवसर दिखाई देता है—जैसे कुछ टैंकरों को सुरक्षित बाहर निकाल लेना—वहां हम उसका इस्तेमाल कर रहे हैं। लाभ उठा लेते हैं।

    शांति स्थापित करने या नियम-आधारित व्यवस्था को फिर से कायम करने की बड़ी प्रक्रिया में हमारी कोई भूमिका नहीं है, क्योंकि हमारा सिद्धांत अवसरवाद बन गया है। इसका मतलब है दुनिया को आकार देना नहीं, बल्कि जहाँ मौका मिले वहाँ अल्पकालिक लाभ उठा लेना।

    संभव है कि यह तरीका काम कर जाए, लेकिन उतनी ही संभावना यह भी है कि यह काम न करे। इसलिए हमें फिर से मूल सिद्धांतों की ओर लौटना चाहिए। भारत की विदेश नीति के बारे में मनमोहन सिंह ने जो कहा था—उसका उद्देश्य क्या था और वह किस कारण से बनाई गई थी—इस पर दोबारा विचार करना एक अच्छी शुरुआत हो सकती है।

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