भागवत दूर से नजर रखे हुए थे और मोदी सरकार के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को लेकर चिंतित थे. सबसे पहला काम तो उन्होंने यह किया कि Gen-Z के आंदोलनकारियों को राष्ट्र-विरोधी बताने वाली आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर दिया.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने अपने संगठन के शताब्दी समारोह की तैयारी के क्रम में खुद अपनी छवि में नाटकीय परिवर्तन लाया है. ऐसा करते हुए उन्हें अपनी रातें बिस्तर में करवटें बदलते बितानी पड़ती हैं या अच्छी नींद लेते हुए, यह वे हमें नहीं बताने वाले. एक तरह का उदारवादी बनना (कुछ ही लोगों के लिए सही) उनकी या किसी भी सरसंघचालक के लिए निर्धारित प्रमुख लक्ष्यों की सूची में शामिल नहीं रहा है.
भागवत ने अपने समर्थकों और कट्टर आलोचकों को भी उलझन में डाल दिया है. कुछ लोगों को लग रहा है कि वे जो उदारवादी रुख अपना रहे हैं उसके कारण संघ के ठोस वैचारिक आधार से किनारा किया जा रहा है. इसके कारण एक ऐसा समूह उभरा है जो पुराने हिंदू रूढ़िवाद और राष्ट्रवाद से चिपका है और मानता है कि भागवत के नेतृत्व में संघ इस विचार से अलग हो रहा है. यह कुछ-कुछ अमेरिका में पक्के रिपब्लिकनों से भी ज्यादा दक्षिणपंथी ‘मागा’ (‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’) वालों जैसा है, हालांकि हम दोनों में बहुत समानता नहीं बता सकते.
इसी तरह भागवत ने उस धुर उदारवादी जमात को भी उलझन में डाल दिया है, जिसके लिए BJP, नरेंद्र मोदी और RSS, तीनों एक त्रिमूर्ति के तीन चेहरे हैं. इस जमात में कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें भागवत ने राहत दी है. क्या यह बदलाव की बयार है? क्या वे मोदी सरकार को चेता रहे हैं? क्या वे RSS की विश्वदृष्टि को मध्यमार्ग के करीब ला रहे हैं? यहां मैं पहले ही स्पष्ट कर दूं कि RSS की मूल विचारधारा और दर्शन में कोई बदलाव नहीं होने जा रहा है. जो कुछ दिख रहा है, वह सत्ता के 13वें साल में राजनीतिक व्यावहारिकता का प्रदर्शन है.
पिछले करीब पांच साल से, भागवत कई प्रमुख तथा विभाजनकारी मसलों पर RSS के रुख में बदलाव को उजागर करते रहे हैं या उसके रुख को अलग तरह से प्रस्तुत करते रहे हैं. वे कई बार कह चुके हैं कि भारत (बल्कि इस पूरे उपमहादेश) के हर व्यक्ति का ‘डीएनए’ समान है, 40 हजार साल पुराना है. इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह किस धर्म का है. वे यह भी कह चुके हैं कि हरेक मस्जिद के नीचे शिवलिंग खोजना बंद कीजिए.
वे, और उनके उत्तराधिकारी माने जा रहे दत्तात्रेय होसबले भी कह चुके हैं कि भारत को पाकिस्तान के साथ रिश्ता बनाए रखना चाहिए. इसे वे दोनों देशों की जनता के बीच संपर्क वाला रिश्ता कह सकते हैं लेकिन यह सरकारी रुख से एक कदम आगे वाला रिश्ता है. यह सब बदलाव को दर्शाता है, जिसने कट्टरपंथियों को नाराज किया है, तो उदारवादियों को उत्साहित किया है. इन्हीं वजहों से पांच प्रमुख मुस्लिम हस्तियों ने 22 अगस्त 2022 को भागवत से संपर्क किया था और संवाद करने की इच्छा जाहिर की थी.
अगर उदारवादी समुदाय सहायता के लिए, या मोदी सरकार को रास्ते पर लाने के लिए RSS के नेतृत्व की ओर देखता है तो कहा जा सकता है कि भारत ने आगे की तरफ कुछ कदम बढ़ाया है. आप इसे संशय की नजर से भी देख सकते हैं, और उम्मीद भरी नजर से भी. यह भी मुमकिन है कि जब सरकार खास तौर से मुश्किल में फंस जाए, जैसे कि जंतर-मंतर प्रकरण, तब वे अच्छे रक्षक की भूमिका में आ जाएं. जिस प्रमुख मंत्री को इस्तीफा दिलवाना पड़ा वे RSS की भी प्रमुख हस्ती थे.
जाहिर है, भागवत दूर से नजर रखे हुए थे और मोदी सरकार के खिलाफ युवाओं के आक्रोश को लेकर चिंतित थे. इसीलिए उन्होंने भारत के ‘इंटरनेशनल मूवमेंट टु यूनाइट नेशन्स’ (IIMUN) की ओर से ‘जेन-जी और जेन-अल्फा’ के साथ सवाल-जवाब के आयोजन में भाग लेने का न्योता कबूल किया. इसमें भागवत ने सबसे पहला काम तो यह किया कि जेन-जी के आंदोलनकारियों को राष्ट्र-विरोधी बताने वाली आलोचनाओं को सिरे से खारिज कर दिया. उन्होंने कहा : “मुझे जेन-जी पर पूरा भरोसा है. विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, यह राष्ट्र-विरोधी काम नहीं है”. उन्होंने स्पष्ट किया कि विरोध और आंदोलन सर्वसहमति बनाने का बुनियादी हिस्सा होता है, “यह इस प्रक्रिया का ही हिस्सा है”. उन्होंने कहा कि युवाओं की शिकायतें, और सुधारों की मांग जायज है. उन्होंने कहा कि शिक्षा पर जीडीपी की 6 फीसदी के बराबर राशि खर्च की जानी चाहिए. लेकिन यह 1950 वाले दशक से एक सपना ही बना रहा है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी उपेक्षित ही होता गया है.
उनसे जब पूछ गया कि वे किस पीढ़ी पर ज्यादा भरोसा करेंगे, तो उनका जवाब था कि वे Gen Z को ही चुनेंगे. उन्होंने कहा कि छात्र आंदोलन लोकतांत्रिक संवाद की प्रक्रिया के जायज और वैध तत्व होते हैं, “खासकर तब, जब संवाद के सामान्य रास्ते बंद हो गए हों”.
वे इतने पर ही नहीं रुके. इसलिए, वे जिन लोगों से संवाद कर रहे थे उनके कारण उन्होंने ज्यादा दिलचस्पी जगाई. उन्होंने कहा: “युवा लोग थोपी गई बातों के मुक़ाबले संवाद के प्रति बेहतर प्रतिक्रिया देते हैं”. उनसे “प्रश्न रहित आज्ञाकारिता” की उम्मीद मत रखिए. युवा पीढ़ी का सम्मान कीजिए. पहली चेतावनी कंगना रनौत को मिली. उन्होंने अपना “Gen Z राष्ट्र विरोधी है” वाला तेवर बदला और शुक्रवार को संसद के बाहर खड़े पत्रकारों से बात करते हुए कहा कि “जेन-जी हमारी सबसे बड़ी ताकत है, और हमें उस पर गर्व है”. यह संशोधन शिखर, ‘सरसंघचालक’ की ओर से आया है.
भागवत की ओर से और भी ज्यादा महत्वपूर्ण तथा कुछ रहस्यमय चेतावनी तब दी गई जब उनसे युवा पीढ़ी को नेतृत्व के बारे में सीख देने का आग्रह किया गया. उनसे पूछा गया कि उनके मुताबिक भावी नेताओं में तीन आदर्श विशेषताएं क्या होनी चाहिए?
उनका जवाब (जिसे मैं अपनी क्षमता के अनुसार संक्षेप में प्रस्तुत कर रहा हूं) था कि सबसे पहले तो नेतृत्व का अर्थ है टीमवर्क यानी एक टीम के रूप में काम करना. उन्होंने कहा कि जब हम आज के किसी नेता के बारे में सोचते हैं तब “एक चित्र आता है”, वह हमारे सामने छा जाता है: वह भाषण दे रहा है, चुनाव जीत रहा है, लोगों को उपदेश दे रहा है. “इससे नहीं होता है”. असली नेता तो वह होता है जो पीछे रहकर काम करता है. “नेतृत्व उसे कहेंगे जो नेताओं का निर्माण करे, केवल खुद ही नेता न बना रहे”.
अब इस पर तो सवाल उठेंगे ही कि उनका इशारा किस तरफ है, या यह कि वे किसी की तरफ इशारा कर भी रहे हैं या नहीं. यह ऐसा सवाल है जिसे BJP के अंदर उठाने या जिसका जवाब देने की हिम्मत कोई नहीं करेगा. लेकिन यह सवाल अनदेखा नहीं रहेगा.
मोदी सरकार ने जंतर-मंतर में जिस तरह घुटने टेके, वह नाटकीय और मुकम्मल था. इससे पहले वरिष्ठ मंत्रियों ने बयान दे दिया था कि यह सरकार कोई यूपीए सरकार नहीं है, और इसके मंत्री दबाव में इस्तीफा नहीं देते. सरकार इस झटके से परेशान थी ही, ऊपर से संसद के मॉनसून सत्र के दबाव के बीच संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने ‘x‘ पर इंदिरा गांधी की एक पुरानी क्लिपिंग शेयर कर दी, जिसमें वे एक विदेशी मीडिया से बात करते हुए इमरजेंसी को जायज ठहराती हैं. भाजपा सरकार का एक कैबिनेट मंत्री इंदिरा गांधी का वह इंटरव्यू शेयर कर रहा है जिसमें वे इमरजेंसी (जिसमें भाजपा और आरएसएस के सभी नेता जेल में बंद थे) को जायज ठहरा रही हैं, इस विडंबना को परे भी रखें तो भी हमें इसे जारी रहने देना होगा. इंदिरा गांधी ने कहा था कि भारत को बाहर से भी और अंदर से भी खतरा पैदा हो गया था, “केवल अंदर से खतरा होता, कोई विदेशी दखल न होता तो हम उससे निबट लेते (इमरजेंसी लगाए बिना)”.
उन्होंने साज़िशों, अराजकता फैलाने की कोशिशों, मोरारजी देसाई द्वारा प्रधानमंत्री निवास और संसद का घेराव करने की इस धमकी का भी जिक्र किया कि “हम कोई कामकाज नहीं होने देंगे. किसी को बाहर निकलने और किसी को अंदर नहीं जाने देंगे”. इंदिरा गांधी ने कहा कि “ये वो लोग थे जो यह मानते थे कि वे चुनाव के जरिए जीत नहीं हासिल कर सकते तो लड़ाई को सड़कों पर ले जाएंगे. ये वो लोग थे जो लोकतंत्र को नष्ट कर रहे थे”.
अब यह तो बहस का मुद्दा बना रहेगा कि क्या वे वास्तव में इतनी घिर गई थीं कि उन्हें इमरजेंसी लगाकर अपने सार्वजनिक जीवन की सबसे बड़ी भूल करनी पड़ी. लेकिन हम अच्छी तरह जानते हैं कि उन्हें इस दुस्साहस के खिलाफ सावधान करने वाली कोई ताकत नहीं थी, कोई वरिष्ठ सलाहकार, मार्गदर्शक, पारिवारिक बुजुर्ग या गुरु नहीं था. आज भागवत और RSS इस बात को रेखांकित कर रहे हैं कि अपनी सरकार के लिए वे इस कमी को पूरी कर रहे हैं. ‘शिष्य’ मोदी सरकार के लिए RSS पारिवारिक बुजुर्ग, या गुरु समान ही है.

